गाड़ी चलाने वाली उम्र में मैं क्यों साइकिल चलाता हूं?

गाड़ी चलाने वाली उम्र में मैं क्यों साइकिल चलाता हूं?

 


हर काम की एक उम्र होती है। उम्र ही है जो हमें बताती है कि हम खत्म हो रहे हैं या शुरू हो रहे हैं। जीवन चलने का नाम है। लेकिन ये चलना कैसे हो? यह तय करना हमारा काम है। तेज चलना है, या रखनी है धीमी रफ्तार। याद है वो दिन जब पहली दफा साइकिल चलाई थी? वो पहला पैडल जो आपने साइकिल पर मारा था। वो दूरी जो आपने साइकिल से कवर की थी। नहीं याद तो आज हम आपको साइकिल की यादों को बिठाकर साइकिलिंग करवाने वाले हैं।


चोट जरूर याद होंगीद आपको उस दिन का अहसास ना हो जब पहली बार आपने साइकिल चलाई थी। लेकिन चोटें जरूर याद होंगी। उन्हें देखिए। हिंट मिल सकता है कई किस्सों का। मेरी यादों से वो दिन जुदा नहीं हो सकता। मां ने पीछे से पकड़ लिया। ‘ओ… चल गई, चल गई, मार पैडल, मार पैडल।’ मैं सीट पर। पैडल मारे जा रहा हूं। साइकिल सच में चल दी। ऐसे लगा जैसे आसमान में चल रही है। जमीन तो है ही नहीं नीचे। मेरे पैर टायर हो चुके हैं। मैंने सोचा मां ने पकड़ रखा है। जब मैं रूका तो पीछे कोई नहीं। गली थी। खाली… बस मां घर के आगे खड़ी हंस रही थी।


‘अब तू सब कुछ चला लेगा’


मेरी मां… मां होने से पहले कबड्डी प्लेयर थी। नाना हमारे थे एथलीट। हॉकी प्लेयर भी। उन्होंने मां को ज्ञान दिया था जो साइकिल चला लेता है, बेटी वो कुछ भी चला सकता है। जिंदगी में खेल है सारा बैलेंस का। यही ज्ञान हमारे दिमाग में ढेल दिया गया। मैं पायलट बनना चाहता था। मां ने ये बात बोल दी। मैंने साइकिल सीख ली। हमारे गावं में मिग-21 गिर गया उन्हीं दिनों। पायलट को पीटने लग गए लोग। क्या करेंगे पायलट बनके साइकिल ही चलाते हैं। कम से कम कोई पीटेगा तो नहीं।


जब हमारी लाइफ में Cycling शब्द नहीं था


मैं साइकिल से बहुत गिरा हूं। लेकिन चोटों के निशान नहीं रहे। पता नहीं कहां चले गए। बचपन में मैं साइकिल से अपने दोस्तों के साथ 20-20 किलोमीटर की दूरी तय करता था। तब ‘साइकिलिंग’ शब्द हमारे जीवन में नहीं था। नहर थी बस।


अब मैं शहर हो गया हूंब मैं बडे़ शहर में रहता हूं। राजधानी दिल्ली। जितना बड़ा शहर उतने बड़े अरमान। यहां आकर मैंने महंगी साइकिल खरीदी। रोज 15-20 किलोमीटर जिसे आसानी से चलाया जा सके। गियर भी लगे हैं। ऊंचाई पर डाला गियर और पैडल मारते गए। साइकिल शहर में चलाना आम बात है। सड़कें फिट हैं। बस पैर चाहिएं। वो हैं। कई बार सोचा कि बेटा तेरी उम्र तो गाड़ी वाली है। शरीर ने कभी ये बात मानी ही नहीं। बचपन जो रहता है शरीर में। बड़ा हुआ ही नहीं।


किधर भी लेकर चले जाओ


सड़कें जाम। बाइक वालों ने साइड में रोक ली। गाड़ियां बीच में। हॉर्न बज रहे हैं। चिल्ल पों हो रही है। आपके पास होनी चाहिए बस एक साइकिल। उठाओ कंधों पर निकल लो। आगे जाकर रखो और चल दो। गाड़ी वाले देखते रहे। बाइक वाले सोच में पड़ गए और तुम पैडल मारके चल दिए।


फिट भी रहोगे, भूख भी ज्यादा लगेगी


रिसर्च तो ज्यादा नहीं पढ़ी। शरीर ने जैसा कहा मान लिया। साइकिलिंग करना फ्री का वर्कआउट है। भूख भी बढ़ जाती है अचानक से। एक्सपेरिमेंट करके देखो। साइकिल को पहले समझो। फिर उसे सड़क पर उतारो। रोज चलाओ। फिटनेस के एक अलग लेवल पर ही पहुंच जाओगे।


नींद से प्यार होने लगेगा


काम रोजी रोटी देने के साथ-साथ चिंता भी देता है। साइकिलिंग करने से नींद बढ़िया आने वाली है आपको। दो दिन से मैं सोया नहीं था। नींद आ ही नहीं रही थी। वर्कआउट भी कर रहा था। मैं साइकिलिंग करने चला गया। रात के 2 बजे थे। एक घंटे बाद आया। गजब की नींद आई। ऐसी नींद… जो सपनों से भरी पड़ी थी। कहते हैं सपनों से भरी नींद खूबसूरत होती है। दुरुस्त होती है।


जीवन का सार होती है साइकिलिंग


‘Life is like riding a bicycle, To keep your balance, you must keep moving’ महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन ने कहा था ये। ‘लाइफ साइकिल चलाने की तरह है। बैलेंस बनाने के लिए आपको मूव करते रहना होगा।’ कई दफा साइकिलिंग करते हुए रास्ते में चढ़ाई आती है। सांसें साथ छोड़ देती हैं। ‘कर हर मैदान फतेह’ टाइप फील करता-करता बंदा साइकिल चढ़ा देता है। फिर आता है आसान रास्ता। पैडल मारने की जरूरत ही नहीं। जिंदगी भी ऐसी ही है। कभी सांसें फूलती हैं तो कभी राहत की सांसें आती हैं।


बाकी का ज्ञान आपको पता ह


प्रदूषण बहुत है, स्पेस कम है, जाम से बच जाओगे। बस आंखें खोलो। साइकिल उठाओ और चलाओ। चलने का नाम साइकिल है। अगर घर पर पड़ी है, कपड़े सूख रहे हैं उसपर तो मुझे उम्मीद है कि साइकिल से प्यार करने वालों का जमीर मरता नहीं। कल वो उतरेगी सड़क पर आपके साथ। दुनिया देखे ना देखे लेकिन आप खुद को जरूर देखोगे।



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