Vasant Panchami 2020: सरस्वती पूजा पर कई शुभ योग, पंचांग भेद के कारण 29 और 30 जनवरी को वसंत पंचमी

Vasant Panchami 2020: सरस्वती पूजा पर कई शुभ योग, पंचांग भेद के कारण 29 और 30 जनवरी को वसंत पंचमी

माघ के महीने में पंचमी तिथि को वसंत पंचमी मनाई जाती है। मान्यता है कि वसंत पंचमी तिथि पर देवी सररस्वती का प्राकट्य हुआ था। शुभ कार्यों का शुभारंभ करने के लिए वसंत पंचमी विशेष शुभ तिथि मानी जाती है। इस दिन विद्या का योग बनने के कारण विद्यारंभ संस्कार किया जाता है। 


ज्योतिष नजरिए से वसंत पंचमी 2020

इस वर्ष वसंत पंचमी पर कई तरह के शुभ योग का निर्माण हो रहा है। ज्योतिष नजरिए से वसंत पंचमी पर कई तरह के राजयोग का निर्माण हो रहा है।
-वसंत पंचमी पर मकर राशि में सूर्य और मीन राशि में चंद्रमा होने से वरिष्ठ योग बनेगा।
- वसंत पंचमी के दिन सिद्धि और सर्वार्थ सिद्धि योग का निर्माण होने यह बहुत ही शुभ फलदायी होता है। इन योगों में अशुभ दोषों का प्रभाव कम हो जाता है।
- वसंत पंचमी पर शनि ग्रह का भी प्रभाव रहेगा। 24 जनवरी को शनि मकर राशि में आने और इनके उदय होने से भी शुभ योग बन रहा है। बीते साल 27 दिसंबर को शनि अस्त चल रहे हैं।
- 30 जनवरी को रवियोग भी बन रहा है। रवि योग को भी ज्योतिष में बहुत शुभ माना गया है।
- बुध,गुरु और शुक्र के योग से शुभकर्तरी योग का निर्माण हो रहा है।
वसंत पचंमी 29 और 30 जनवरी को
इस बार वसंत पचंमी तिथि को लेकर मतभेद है। इस बार माघ महीने के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि का आरंभ 29 जनवरी को सुबह 10 बजकर 46 मिनट पर है। पंचमी तिथि की सामाप्ति 30 जनवरी को दोपहर 1 बजकर 20 मिनट तक रहेगा। अंग्रेजी कैलेंडर के तारीख के अनुसार पंचमी तिथि 29 और 30 जनवरी को पड़ने के कारण मतभेद है। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार उदया तिथि के कारण 30 जनवरी को ही वसंत पंचमी मनाई जाएगी। यानी 30 तारीख को पंचमी तिथि में सूर्योदय होने से इसी दिन वसंत पंचमी पर्व मनाना श्रेष्ठ रहेगा। हालांकि कई जगहों पर 29 जनवरी को भी वसंत पंचमी मनाई जा रही है।
ऐसे हुआ देवी सरस्वती का प्राकट्य
सृष्टि के प्रारंभिक काल में भगवान विष्णु की आज्ञा से ब्रह्मा जी ने जीवों खासतौर पर मनुष्य योनि की रचना की। अपनी सर्जना से वे संतुष्ट नहीं थे, उन्हें लगा कि कुछ कमी रह गई है, जिसके कारण चारों ओर मौन छाया हुआ है। भगवान विष्णु से अनुमति लेकर ब्रह्मा जी ने अपने कमंडल से जल छिड़का, पृथ्वी पर जलकण बिखरते ही उसमें कम्पंन होने लगा। इसके बाद एक चतुर्भुजी स्त्री के रूप में अद्भुत शक्ति का प्राकट्य हुआ, जिसके एक हाथ में वीणा तथा दूसरा हाथ वर मुद्रा में था। अन्य दोनों हाथों में पुस्तक एवं माला थीं।
ऐसे मिली जीव-जंतुओं को वाणी 
ब्रह्मा जी ने देवी से वीणा बजाने का अनुरोध किया। जैसे ही देवी ने वीणा का मधुर नाद किया, संसार के समस्त जीव-जंतुओं को वाणी प्राप्त हो गई। जलधारा में कोलाहल व्याप्त हो गया व पवन चलने से सरसराहट होने लगी। तब ब्रह्माजी ने उस देवी को वाणी की देवी सरस्वती कहा। सरस्वती को बागीश्वरी, भगवती, शारदा, वीणावादिनी और बाग्देवी सहित अनेक नामों से पूजा जाता है। ये विद्या और बुद्धि की प्रदाता हैं, संगीत की उत्पत्ति करने के कारण ये संगीत की देवी कहलाती हैं।

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